सोमवार, 5 अगस्त 2013

बेटी घर का चिराग नहीं होती!!!



13 जुलाय 2013 के जनसत्ता में शिशिर कुमार यादव का दुनियां मेरे आगे में बिट्टी की चीख शीर्षक से लेख छपा। इसमें लेखक ने अपने गांव की 15-16 साल की लड़की की अपने से दूनी उम्र के पुरुष से बेमेल विवाह होजाने की वजह से मानसिक संतुलन खो देने,तथा बाद में आग लगा कर आत्महत्या करने की दुख भरी दास्तान बताई । यह कोई एक दिन की घटना नही थी। ससुराल में उसके काम करने की क्षमता में कमी आते ही वे इसको भूत लग गया है कह कर उसे मायके छोड़ दिया गया था। मायके में घर गांव वालों ने उसको पागल तो बता दिया पर इलाज नही कराया। हां उसको चिढ़ा कर परेशान अवश्य किया।  जब वह मर गई या मार दी गई (लेखक मौत को एक रहस्यमय बताता है) तो इसकी खबर भी पुलिस को नहीं दी गई। यदि वह लड़का होती तो क्या उसकी यही नियति होती? क्या उसका इलाज नहीं होता?
      जुलाय 17 को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट रवनीत गर्ग की पत्नी गीतांजलि का गोलियों से छलनी हुआ शव गुड़गांव की पुलिस लाइंस परिसर में मिला। गीतांजलि के भाई ने इसे दहेज हत्या का मामला बताया। उसके मुताबिक गीतांजलि के विवाह में भारी रकम खर्च की गई थी। इसमें 17 लाख रुपये की एक स्कोडा लारा भी थी।शादी के दो साल बाद 20 लाख रुपये की स्कोडा सुपर्ब भी दबाव में देनी पड़ी। इसी साल मई में दो लाख रुपये नकद दिये गए। (जनसत्ता 31 जुलाय 2013) सवाल है इतना धन देकर भी गीतांजलि को उस नरक में क्यों रहने दिया गया। क्या इस धन का उपयोग गीतांजलि तथा उसकी दे बच्चियों के सुनहरे भविष्य के निर्माण के लिए नहीं किया जासकता था? किया जासकता था अगर गीतांजलि घर का चिराग होती। उसको भीख या दान नहीं हक मिलता।

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