शनिवार, 23 नवंबर 2013

निजता,सुरक्षा, या परिवार की इज्जत के नाम पर मुह बंद रखो


तहलका में जो तहलका हुआ वह सचमुच दिल दहलाने वाला है। यदि हर प्रकार के दबाव से बेखौफ होकर मुद्दों को उठाने वाले ही जब अपने पर बन आती है तो मुद्दों,कानून, कानूनी प्रक्रिया को ठेंगा दिखाते हैं तो दिल तो दहलेगा ही।लीपा पोती करने के बजाय यदि तरुण तेजपाल अपनी गल्ती मानकर अपने को कानून का हवाले कर देते तो उनको कानून के हिसाब से सजा तो होती लेकिन उनका कद छोटा नहीं होता।तहलका संस्थान का भी पीड़़िता की निजता बनाए रखने के बहाने इस घटना की पुलिस में रपट दर्ज न करवाना भी संस्थान के लोगों की कथना और करना में भेद करता है। कितना आसान है दूसरे पर अंगुली उठाना और कितना मुश्किल है अपनी गल्ती मानते का साहस करना। आखिर गल्ती तो इंसान से ही होती है। यदि गल्ती होगई तो प्राश्चित का ढ़ौग करने के बजाय सजा भुगतने के लिए तैयार रहने के लिए अधिक प्रतिबद्धता, साहस तथा कर्तब्य परायणता की आवश्यकता होती है।
इस घटना की जानकारी सार्वजनिक होने के बाद सारे टी वी चैनलों में बहस शुरू होगई। कुछ लेख भी पढ़ने को मिले।इनमें कुछ महिलावादियों तथा विशेषज्ञों की भी राय थी कि पीड़िता की निजता की सुरक्षा के लिए यदि वह रिपोर्ट दर्ज नही कराती तो अनुचित नहीं है। पढ़कर सुनकर हैरानी हुई। दिसंबर 2012 में दिल्ली की सड़कों में यौन हिंसा को रोकने के लिए मजबूत कानून की मांग की जारही थी। यदि पीड़िता कानून की मदद लेने से निजता का हनन होता है तो मजबूत कानून की मांग का औचित्य क्या था। दूसरा यदि निजता इतनी अनुल्लघंनीय(सैक्रोसेंक्ट)है तो जब गरीबों के घरों या झुग्गियों में यौन हिंसा होती है तो महिला संगठन द्वारा क्यों सबसे पहले पुलिस में रिपोर्ट दर्ज की जाती है। क्यों नहीं तहलका संस्थान की तरह ये संगठन भी अंय तरीकों (माफीनामा या मुआवजा आदि)से मामला सुलटाने की कोशिश नहीं करते। यहां यह जोड़ना भी प्रासंगिक है कि अक्सर पुलिसवाले आरोपी से मिलकर गरीब पीड़ित को कुछ पैसे लेकर चुप रहने का दबाव डालते रहते हैं। और उनके इस काम की बहुत भर्तसना होती है। यदि वह गलत है तो माफी मांग कर मुह बंद करवाना या कानूनी पेजीदिकियों में फसकर परेशान होने का डर दिखाकर मुह बंद करने का इशारा करना किसके हित में है पीड़िता या आरोपी।
चूंकि यह व्यक्ति का नहीं संस्थान के रुख का मामला है तथा एक वर्ग के लोगों के फसने का मामला है।इसलिए यहां पर वर्ग का अपने आरोपी को बचाने की कोशिश बड़े कूटनीतिक तरीके से किये जारहे हैं। दिसंबर 2012 में जब दामिनि के केस ने पूरी दिल्ली को हिला दिया उस समय आरोपियों का गरीब होना, अनपढ़ होना, झुग्गीवासी होना, ग्रामीण परिवेश का होना भी आलोचना का मुद्दा था। उस वीभत्स कांड के लिए ये सब कारकों को भी जिम्मेदार माना गया।
हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि समानता लालीपाप नहीं है। समानता , स्वतंत्रता तथा न्याय पाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है।यदि हम अपने अपने आरोपियों को निजता की सुरक्षा, नारी के संरक्षण या परिवार की इज्जत के नाम पर बचाते रहे तो केवल गरीबों को कानून के शिकंजे में कसने से  समानता , स्वतंत्रता तथा न्याय की प्राप्ति नारी को नहीं होसकती। पुलिस थानों   कोर्ट के चक्कर हों या बीमारी की हालत में अस्पताल के चक्कर काफी तकलीफदेह होते हैं पर जब सिर पर पड़ जाते हैं तो सभी ये चक्कर लगाते ही हैं। केवल न्याय पाने की कोशिश में महिला को रोकने के लिेए ही ये परेशानी का सबब नही होते। हां अधिक तकलीफदेह जरूर होते हैं।

सोमवार, 5 अगस्त 2013

यह अस्मिता का प्रश्न है



हाल ही में उच्चतम् न्यायालय के माननीय जस्टिस अल्तमस कबीर तथा मार्कंडेय काटजू की खंडपीठ ने दलितों के लिए अपमानसूचक शब्दों के प्रयोग को गैरकानूनी बताया तथा इनके इस्तेमाल को दंडनीय करार दिया। ( Expressindia19,08,08 www.expressindia.com) जजों का कहना था कि लोकतंत्र के इस युग में किसी व्यक्ति या समाज अथवा समुदाय को हीन नही माना जाना चाहिये। दुर्भाग्य से दलित आदिवासी ही नही हमने अपने से भिन्न रंग रूप / शारीरिक बनावट/ व जीवनशैली वाले हर व्यक्ति एवं समूह को हेय दृष्टि से देखने की संस्कृति विकसित की है। यदि यह व्यक्ति या समूह आर्थिक दृष्टि से भी कमजोर है तो इसको नीचा दिखाने का, इसका शोषण व दमन करने का मानो हमें लाइसेंसं ही मिल गया है। चूंकि भारत में जाति भेद तथा पश्चिम में रंग भेद का मामला राजनीतिक रूप से संवेदनशील होगया था इसलिए राजनीतिक व्यवस्थाओँ ने रंग अथवा जाति आधारित भेदभाव के विरुद्ध कानून बना दिए। महिलाओं, अल्पसंख्यकों तथा विकलागों आदि के लिए अपमानसूचक शब्दों का प्रयोग निर्विरोधहोता रहा है ।
महिला आंदोलनों के जोर पकड़ने के साथ साथ सैक् सिस्ट भाषा का प्रयोग गैर कानूनी होगया। भारत में विशाखा केस में उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद कम से कम जागरूक वर्ग की स्त्रियों को स्वयं के लिए कहे गए अपमानसूचक शब्दों के प्रयोग के विरुद्ध लड़ने का हथियार मिल गया है। हांलाकि रोजमर्रा के जीवन में आज भी आम स्त्री औरत होने का दंश भोग रही है और दंश देने वाले अपने पराए दोनों ही कानून और न्यायालय से बेखौफ दंश बार बार देने में कोई कोताही नही बरतते हैँ । अल्पसंख्यक समाज भी समय समय पर उनके विरुद्ध गढ़ी गई रूढ़िबद्ध धारणाओं का विरोध करते रहते हैं। परन्तु धारणाऐ बरकरार हैं और धड़ल्ले से उनकी अभिव्यक्ति भी होती है।
पूरे विश्व में विकलांग समाज ही शायद ऐसा है जो अ-विकलांग समाज की हेय दृष्टि, उपेक्षित व्यवहार, तिरिस्कारपूर्ण भाषा का चुपचाप विष का पान करते आरहा है।स्मर्णीय है कि विकलांग का सबसे बड़ा अपमान उसकी क्षमता का अनादर/ उपेक्षा/अविश्वास /अवमानना है।अपने देश का संभ्रांत तथा तथाकथित जागरूक समाज विकलांगता के प्रति कितना असंवेदनशील होसकता है इसका एक उदाहरण हाल ही में बम्बई उच्च न्यायालय के उस फैसले पर आई प्रतिक्रियाएं हैं जिसमें हरेश और निकेता
मेहता को 25 सप्ताह का गर्भ गिराने की इजाजत नही दी गई।समाचार चैनलों ने जिन मध्यवर्गीय माता पिता की प्रतिक्रिया जाननी चाही उनमें से अधिकांश का मानना था कि विकलांग बच्चों के लालन पालन का बोझ आज के युगलों की क्षमता से बाहर है। दूसरा विकलांग बच्चा अविकलांग बच्चे की तरह सफलता की सीड़ी धड़ाधड़ नही चढ़ सकता। प्रतिस्पर्धा में इस प्रकार पिछड़ना विकलांग बच्चे तथा उसके अविकलांग माता पिता दोनों के लिए दुखदायी है। इस दुख से निजात पाने का सबसे आसान एवं सस्ता तरीका कानून में संसोधन कर गर्भपात का अधिकार मां को देने की वकालत की गई।
नारीवादी ऐक् टिविस्टों यहां तक कानूनवेत्ताओं का भी मानना था कि विकलांग बच्चों की परवरिश का अतिरिक्त बोझ मां को ही ढ़ोना पड़ता है तथा कइयों की गृहस्थी विकलांग बच्चों की वजह से टूट जाती है। अतः मां को विकलांग बच्चे के गर्भपात की छूट होनी चाहिये।इस तर्क को देते समय नारीवादी ऐक्टिविस्ट व कानूनवेत्ता भूल गए कि बच्ची को पालने का अतिरिक्त बोझ भी मां को ही ढ़ोना पड़ता है तथा कइयों की गृहस्थी बार बार बच्चियों के जन्म की वजह से टूट जाती है। इसीलिए अब युगल सयाने होगए हैं और परिणाम हमारे सामने हैं।
अ-विकलांग समाज उनकी क्षमता में अविश्वास व्यक्त करने में कोई कोताही नही बरतता। दुर्भाग्य से तथाकथित विकसित देशों की मानसिकता भी विकलांगों की क्षमता में अविश्वास करने की है। विकसित देशों का संदर्भ महत्वपूर्ण हैं । कारण वहा विज्ञान तकनीक का उच्च स्तर का विकास हुआ है जिसकी वजह से विकलांग अपने अक्षम अंग की कमी की काफी हद तक भरपाई कर पा रहे हैं साथ ही अधिक से अधिक संख्या में उचित शिक्षा पाकर समाज की मुख्य धारा से जुड़ रहे है। वहां विकलांगों के लिए शिक्षा व रोजगार पाना सामान्य प्रक्रिया होगई है। फिर भी समानता नहीं है। उदाहरण के लिए


संयुक्त राज्य अमेरिका में अविकलांग अमेरिकी ही आदर्श रोल माडल माना जाता है।
1993-94 में जोसफ शैपिरो ने दया नहीं पुस्तक छापी। इस किताब में संयुक्त राज्य अमेरिका में विकलांगों के अधिकारों के संघर्ष की दास्तां है। इस दास्तां का प्रारंभ शैपिरो अ-विकलांग अमेरिकी लोगों की विकलागों को अपने मापदंडों से मापने की आदत का ब्यौरा देकर करते हैं।ब्यौरा अत्यतं सटीक है। शैपिरो बताते हैं कि विकलांगों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले प्रसिद्ध वकील तिमोथी कुक को बचपन में ही पोलियो होगया था। इसलिए उनको पावों में भारी जूते पहनने पड़ते थे। उन जूतों की वजह से कुक को चलने में असुविधा होती थी।लेकिन कुक ने इसको कभी एक बाधा नही समझा। इसीलिए शायद उनकी शोक स्मृति में आयोजित सभा में अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए उनके दोस्तों ने कहा कि उनको कभी एहसास ही नही हुआ कि तिमोथी कुक विकलांग हैं। या जिन लोगों से हम मिले हैं उनमें कुक सबसे कम विकलांग थे। ऐसा कहते हुए इन दोस्तों को लेशमात्र भी नही लगा कि वे विकलांगों को हेय नजर से देख रहे थे। वास्तव में यह कुक को श्रद्धांजलि नही थी। कुक के विकलांग दोस्तों का इस तरह के बयानों से दिल टूट रहा था। परन्तु कुक के सामांय दोस्तों को इस बात का भान ही नही था कि विकलांगों के लिए अस्मिता का प्रश्न उतना ही महत्वपूर्ण था जितना किसी भी समाज या समुदाय के लिए होता है।

विज्ञान का यह करिष्मा भी दोधारी रहा है। दवाओं से विकलांगता का इलाज तो नही संभव हुआ है। लेकिन लंबी आयु संभव हुई है। बुढ़ापे व बीमारी की वजह से विकलांगों की संख्या में इजाफा हुआ है।विज्ञान और तकनीक ने जीवन की रफ्तार बढ़ाई तो इससे भी विकलांगता में इजाफा हुआ। प्राकृतिक साधनों के दोहन की गति भी तीव्र हुई। पर्यावरण का संतुलन बिगड़ा। प्रदूषण फैला। अमीर व गरीब के बीच की खाई चौड़ी हुई। कुपोषण बढ़ा।समाज में हिंसा बढ़ी। इन सब कारणों से विकलांगता भी बढ़ी।
विज्ञान और विकलांगता के इस घालमेल में द्वितीय विश्व युद्ध मील का पत्थर साबित हुआ। इस युद्ध में विकलांग हुए करीब दो हजार अमेरिकी सैनिक लम्बे समय तक जिंदा रहे। इसके बाद तो जो नई नई दवाइयां, ओपरेशन की तकनीक आई उससे अमेरिका सहित समस्त विकसित देशों मेंलंबी जिंदगी संभव होगई। बुढ़ापा अपने साथ अक्सर विकलांगता लाता है।इस प्रकार विकलांगों की संख्या बढ़ी। साथ ही राज्य की बूढ़े विकलांगों की देखभाल की जिम्मेदारी भी बढ़ी।
जिम्मेदारी को निभाने के लिए नीति की आवश्यकता पड़ी।इसी बीच युवा विकलांग समाज में अपने लिए सम्मानजनक वातावरण तैयार करने में लगे थे। वातावरण तैयार करने की इस प्रक्रिया में उनको कदम कदम पर एक ऐसी व्यवस्था से टक्कर लेनी पड़ी जिसमें विकलांगों के लिए कोई स्थान नही था। यही से विकलांगों के अधिकारों के आंदोलन की शुरुआत हुई।

बेटी घर का चिराग नहीं होती!!!



13 जुलाय 2013 के जनसत्ता में शिशिर कुमार यादव का दुनियां मेरे आगे में बिट्टी की चीख शीर्षक से लेख छपा। इसमें लेखक ने अपने गांव की 15-16 साल की लड़की की अपने से दूनी उम्र के पुरुष से बेमेल विवाह होजाने की वजह से मानसिक संतुलन खो देने,तथा बाद में आग लगा कर आत्महत्या करने की दुख भरी दास्तान बताई । यह कोई एक दिन की घटना नही थी। ससुराल में उसके काम करने की क्षमता में कमी आते ही वे इसको भूत लग गया है कह कर उसे मायके छोड़ दिया गया था। मायके में घर गांव वालों ने उसको पागल तो बता दिया पर इलाज नही कराया। हां उसको चिढ़ा कर परेशान अवश्य किया।  जब वह मर गई या मार दी गई (लेखक मौत को एक रहस्यमय बताता है) तो इसकी खबर भी पुलिस को नहीं दी गई। यदि वह लड़का होती तो क्या उसकी यही नियति होती? क्या उसका इलाज नहीं होता?
      जुलाय 17 को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट रवनीत गर्ग की पत्नी गीतांजलि का गोलियों से छलनी हुआ शव गुड़गांव की पुलिस लाइंस परिसर में मिला। गीतांजलि के भाई ने इसे दहेज हत्या का मामला बताया। उसके मुताबिक गीतांजलि के विवाह में भारी रकम खर्च की गई थी। इसमें 17 लाख रुपये की एक स्कोडा लारा भी थी।शादी के दो साल बाद 20 लाख रुपये की स्कोडा सुपर्ब भी दबाव में देनी पड़ी। इसी साल मई में दो लाख रुपये नकद दिये गए। (जनसत्ता 31 जुलाय 2013) सवाल है इतना धन देकर भी गीतांजलि को उस नरक में क्यों रहने दिया गया। क्या इस धन का उपयोग गीतांजलि तथा उसकी दे बच्चियों के सुनहरे भविष्य के निर्माण के लिए नहीं किया जासकता था? किया जासकता था अगर गीतांजलि घर का चिराग होती। उसको भीख या दान नहीं हक मिलता।