कबूतरों का प्रतिशोध
19 अप्रेल 2016 तक कबूतर
के बारे में मेरी धारणा एक भोले भाले शांतिप्रिय प्राणी की थी। 19 अप्रेल के बाद
कबूतरों का जो रूप देखा उससे में अचंभित हूं। उस दिन मैं कमरे में अपने चचेरे भी
के साथ गपसप कर रही थी। अचानक मेरे पावों के पास तीन कबूतर लड़ते हुए आए। मैंने
उन्हें भगाया तो एक कबूतर(जो बच्चा था। उसके पर उग आए थे । पर वह अधिक ऊंचाई तक
नहीं उड़ सकता था।) अंदर के कमरे में चला गया । और दो बाहर बरामदे में चले गए। भाई
के जाने के बाद मैंने देखा कि वह बच्चा कमरे में ही दुबका बैठा था। उसका सिर बुरी
तरह नोचा गया था। मैंने उसे खाने के लिए बाजरा दिया तथा पानी भी ऱख दिया।साथ ही
दोनों बरामदों के दरवाजे खोल दिये। ताकि यदि वह बाहर जाना चाहे तो जासके है।
कुछ समय बाद वह सामने वाले बरामदे में चला गया
। वहां पर खाना पानी दोनों होता है। अतः मैं निश्चिंत थी। लेकिन कुछ समय बाद मैंने
घर के अंदर से ही अजीब सी (दुखदाई )आवाज सुनी । वहां जाकर देखा तो वही दो कबूतर
फिर उसको सिर में व पीठ में चोंच से नोच रहे थे। दर्द के मारे वह हृदयविदारक चीख
निकाल रहा था। मैंने उन कबूतरों को भगा दिया। कुछ समय बाद वह बच्चा रसोई व अन्य
कमरों में अपने लिए ठिखाना खोजने लगा।
उसको कोई भी कोना पसंद नही आया।शाम के समय फिर वह सामने वाले बरामदे
में चला गया। वहां उसने पानी पिया.।फिर गमलों के आसपास मडराने लगा। उसके आताताइयों
ने उसको देख लिया और वही पर दबोच लिया। उसकी पीठ का एक पर वे अपनी चोंच में ले गए।
मैंने उनको भगाया तो वह बच्चा फिर घर के अंदर घुस गया । अब उसने बाहर के कमरे में
डेरा डाल लिया । यहां से वह बाहर देख सकता था। लेकिन उसको घर के अंदर बिलकुल अच्छा
नही लग रहा था। जाली के दरवाजे या बंद खिड़की से वह बाहर झाकता रहता था। जाली के
दरवाजे के बाहर वे दो कबूतर पहरा दे रहे थे। जैसे ही बच्चा दरवाजे के करीब जाता वे
भी बाहर से दरवाजे के सामने आजाते। यह फिर कुर्सी के नीचे दुबक जाता।अंधेरा होने
के बाद आंखमिचोनी का यह खेल खत्म हो गया। बच्चा कबूतर कुर्सी के नीचे छिप कर सो
गया। उसको हमसे भी डर लग रहा था। अगले दिन बच्चा देर से उठा। कमरे की सफाई के समय
दूसरी कुर्सी के नीचे दुबक कर बैठ गया। वे दोनों जाली के दरवाजे के बाहर इसकी राह
तकते रहे।दिन बढ़ने के साथ साथ इसकी घर के अंदर घुटन बढ़ने लगी। यह बहुत उदास लग
रहा। अब जाली के दरवाजे के सामने जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। थोडा सा भी
दरवाजा खुलने पर वे दोनो अंदर घुस आते थे। शाम तक इसने खिड़की से बाहर झांकने की
हिम्मत जुटा ली। अंत में बाहर जाने की आशा में यह अंदर के कमरे में चला गया जहां
इसे बड़ी खिड़की दिखी। परंतु वह बंद थी । यह उससे बाहर नही जा सकता। खैर यह वहीं
पर बैठा रहा। अंधेरा होने पर यह वापस आकर कुर्सी के नीचे दुबक कर सो गया।
तीसरे दिन वह तरोताजा उठा। अब उसे फर्स पर
फुदकना रास नहीं आरहा था। वह एक कुर्सी से दूसरी पर फुदकता। फिर किताबों की रैक के
ऊपर चढ़ गया
।टेलीफोन और मोडम के ऊपर बैठने में उसे मजा आरहा था। जाली के दरवाजे में पंजे फसा
कर ऊपर चढ़ने की कोशिश में बार बार नीचे गिर रहा था। पर था मस्त। पहले दिन की
मायूसी गायब हो गई थी। बाहर इसके आताताई इसका इंतजार कर रहे थे।पर यह डर नही रहा
था । मैंने जाली का दरवाजा खोल दिया।यह बिलकुल भी नहीं डरा। वे लोग पहले बाहर से
स्थिति का मुआयना करते रहे।एक बाहर के दरवाजे के ऊपर से पूरी स्थिति का जायजा ले
रहा था। दूसरा धीरे धीरे कमरे के अंदर घुसा और फर्स पर ही इधर उधर फुदकने लगा।यह बच्चा
मोडम के ऊपर बैठा था। मैंने सोचा कि शायद ये लोग संधि करने आए हों। पर क्या दरवाजे
के ऊपर बैठा कबूतर उड़ कर रैक के ऊपर बैठ गया। थोड़ी देर के बाद बच्चे के पास
टेलिफोन के ऊपर बैठ गया। फिर मोका मिलते ही बच्चे को चोंच से घायल करने लगा। मैंने
फिर उन दोनों को भगा दिया। बच्चा इस बार घबराया नहीं वह मस्त था। सारा समय इधर उधर
फुदक रहा था। शाम को शो केस के ऊपर बैठ गया। और वही रात को सो गया।दूसरे दिन सुबह सुबह
नीचे आया और जाली के दरवाजे में पंजे मारने लगा। बाहर उसके आताताई नहीं थे। मैंने
जाली का दरवाजा खोल दिया। वह फुर्र करके उड़ गया।
रोज की तरह समय पर उसके आताताई आ धमके। मैंने
फटाक से दरवाजा खोल दिया ।उन्होंने घर का कोना कोना छान मारा। लेकिन वह बच्चा नहीं
मिला।पूरे दो दिन तक यह जोड़ा थोड़ी थोड़ी देर बाद घर में घुसता और सारे घर का
मुआयना करता फिर चला जाता। तीसरे दिन आना
कुछ कम हुआ।कल भी दो तीन बार आए। पर आज उनको मैंने नही देखा।
कबूतरों को देखकर नही लगता उनके अंदर प्रतिशोध
की भावना इतनी तीव्र होती है और यह प्रतिशोध शायद जान लेकर ही होता है। इसमें बच्चों को माफी नहीं होती।
क्या हिंसा में ये खाप पंचायत से कम हैं।