तहलका में जो तहलका हुआ वह सचमुच दिल
दहलाने वाला है। यदि हर प्रकार के दबाव से बेखौफ होकर मुद्दों को उठाने वाले ही जब
अपने पर बन आती है तो मुद्दों,कानून, कानूनी प्रक्रिया को ठेंगा दिखाते हैं तो दिल
तो दहलेगा ही।लीपा पोती करने के बजाय यदि तरुण तेजपाल अपनी गल्ती मानकर अपने को
कानून का हवाले कर देते तो उनको कानून के हिसाब से सजा तो होती लेकिन उनका कद छोटा
नहीं होता।तहलका संस्थान का भी पीड़़िता की निजता बनाए रखने के बहाने इस घटना की
पुलिस में रपट दर्ज न करवाना भी संस्थान के लोगों की कथना और करना में भेद करता
है। कितना आसान है दूसरे पर अंगुली उठाना और कितना मुश्किल है अपनी गल्ती मानते का
साहस करना। आखिर गल्ती तो इंसान से ही होती है। यदि गल्ती होगई तो प्राश्चित का
ढ़ौग करने के बजाय सजा भुगतने के लिए तैयार रहने के लिए अधिक प्रतिबद्धता, साहस
तथा कर्तब्य परायणता की आवश्यकता होती है।
इस घटना की
जानकारी सार्वजनिक होने के बाद सारे टी वी चैनलों में बहस शुरू होगई। कुछ लेख भी
पढ़ने को मिले।इनमें कुछ महिलावादियों तथा विशेषज्ञों की भी राय थी कि पीड़िता की
निजता की सुरक्षा के लिए यदि वह रिपोर्ट दर्ज नही कराती तो अनुचित नहीं है। पढ़कर
सुनकर हैरानी हुई। दिसंबर 2012 में दिल्ली की सड़कों में यौन हिंसा को रोकने के
लिए मजबूत कानून की मांग की जारही थी। यदि पीड़िता कानून की मदद लेने से निजता का
हनन होता है तो मजबूत कानून की मांग का औचित्य क्या था। दूसरा यदि निजता इतनी
अनुल्लघंनीय(सैक्रोसेंक्ट)है तो जब गरीबों के घरों या झुग्गियों में यौन हिंसा होती
है तो महिला संगठन द्वारा क्यों सबसे पहले पुलिस में रिपोर्ट दर्ज की जाती है। क्यों
नहीं तहलका संस्थान की तरह ये संगठन भी अंय तरीकों (माफीनामा या मुआवजा आदि)से
मामला सुलटाने की कोशिश नहीं करते। यहां यह जोड़ना भी प्रासंगिक है कि अक्सर
पुलिसवाले आरोपी से मिलकर गरीब पीड़ित को कुछ पैसे लेकर चुप रहने का दबाव डालते
रहते हैं। और उनके इस काम की बहुत भर्तसना होती है। यदि वह गलत है तो माफी मांग कर
मुह बंद करवाना या कानूनी पेजीदिकियों में फसकर परेशान होने का डर दिखाकर मुह बंद
करने का इशारा करना किसके हित में है पीड़िता या आरोपी।
चूंकि यह
व्यक्ति का नहीं संस्थान के रुख का मामला है तथा एक वर्ग के लोगों के फसने का
मामला है।इसलिए यहां पर वर्ग का अपने आरोपी को बचाने की कोशिश बड़े कूटनीतिक तरीके
से किये जारहे हैं। दिसंबर 2012 में जब दामिनि के केस ने पूरी दिल्ली को हिला दिया
उस समय आरोपियों का गरीब होना, अनपढ़ होना, झुग्गीवासी होना, ग्रामीण परिवेश का
होना भी आलोचना का मुद्दा था। उस वीभत्स कांड के लिए ये सब कारकों को भी जिम्मेदार
माना गया।
हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि समानता लालीपाप नहीं है। समानता , स्वतंत्रता तथा न्याय पाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है।यदि हम अपने अपने आरोपियों को निजता की सुरक्षा, नारी के संरक्षण या परिवार की इज्जत के नाम पर बचाते रहे तो केवल गरीबों को कानून के शिकंजे में कसने से समानता , स्वतंत्रता तथा न्याय की प्राप्ति नारी को नहीं होसकती। पुलिस थानों व कोर्ट के चक्कर हों या बीमारी की हालत में अस्पताल के चक्कर काफी तकलीफदेह होते हैं पर जब सिर पर पड़ जाते हैं तो सभी ये चक्कर लगाते ही हैं। केवल न्याय पाने की कोशिश में महिला को रोकने के लिेए ही ये परेशानी का सबब नही होते। हां अधिक तकलीफदेह जरूर होते हैं।