रविवार, 24 अगस्त 2008

यह अस्मिता का प्रश्न है

हाल ही में उच्चतम् न्यायालय के माननीय जस्टिस अल्तमस कबीर तथा मार्कंडेय काटजू की खंडपीठ ने दलितों के लिए अपमानसूचक शब्दों के प्रयोग को गैरकानूनी बताया तथा इनके इस्तेमाल को दंडनीय करार दिया। ( Expressindia19,08,08 http://www.expressindia.com/) जजों का कहना था कि लोकतंत्र के इस युग में किसी व्यक्ति या समाज अथवा समुदाय को हीन नही माना जाना चाहिये। दुर्भाग्य से दलित आदिवासी ही नही हमने अपने से भिन्न रंग रूप / शारीरिक बनावट/ व जीवनशैली वाले हर व्यक्ति एवं समूह को हेय दृष्टि से देखने की संस्कृति विकसित की है। यदि यह व्यक्ति या समूह आर्थिक दृष्टि से भी कमजोर है तो इसको नीचा दिखाने का, इसका शोषण व दमन करने का मानो हमें लाइसेंसं ही मिल गया है। चूंकि भारत में जाति भेद तथा पश्चिम में रंग भेद का मामला राजनीतिक रूप से संवेदनशील होगया था इसलिए राजनीतिक व्यवस्थाओँ ने रंग अथवा जाति आधारित भेदभाव के विरुद्ध कानून बना दिए। महिलाओं, अल्पसंख्यकों तथा विकलागों आदि के लिए अपमानसूचक शब्दों का प्रयोग निर्विरोध
होता रहा है । महिला आंदोलनों के जोर पकड़ने के साथ साथ सैक् सिस्ट भाषा का प्रयोग गैर कानूनी होगया। भारत में विशाखा केस में उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद कम से कम जागरूक वर्ग की स्त्रियों को स्वयं के लिए कहे गए अपमानसूचक शब्दों के प्रयोग के विरुद्ध लड़ने का हथियार मिल गया है। हांलाकि रोजमर्रा के जीवन में आज भी आम स्त्री औरत होने का दंश भोग रही है और दंश देने वाले अपने पराए दोनों ही कानून और न्यायालय से बेखौफ दंश बार बार देने में कोई कोताही नही बरतते हैँ । अल्पसंख्यक समाज भी समय समय पर उनके विरुद्ध गढ़ी गई रूढ़िबद्ध धारणाओं का विरोध करते रहते हैं। परन्तु धारणाऐ बरकरार हैं और धड़ल्ले से उनकी अभिव्यक्ति भी होती है।
पूरे विश्व में विकलांग समाज ही शायद ऐसा है जो अ-विकलांग समाज की हेय दृष्टि, उपेक्षित व्यवहार, तिरिस्कारपूर्ण भाषा का चुपचाप विष का पान करते आरहा है।स्मर्णीय है कि विकलांग का सबसे बड़ा अपमान उसकी क्षमता का अनादर/ उपेक्षा/अविश्वास /अवमानना है।अपने देश का संभ्रांत तथा तथाकथित जागरूक समाज विकलांगता के प्रति कितना असंवेदनशील होसकता है इसका एक उदाहरण हाल ही में बम्बई उच्च न्यायालय के उस फैसले पर आई प्रतिक्रियाएं हैं जिसमें हरेश और निकेता
मेहता को 25 सप्ताह का गर्भ गिराने की इजाजत नही दी गई।समाचार चैनलों ने जिन मध्यवर्गीय माता पिता की प्रतिक्रिया जाननी चाही उनमें से अधिकांश का मानना था कि विकलांग बच्चों के लालन पालन का बोझ आज के युगलों की क्षमता से बाहर है। दूसरा विकलांग बच्चा अविकलांग बच्चे की तरह सफलता की सीढ़ी धड़ाधड़ नही चढ़ सकता। प्रतिस्पर्धा में इस प्रकार पिछड़ना विकलांग बच्चे तथा उसके अविकलांग माता पिता दोनों के लिए दुखदायी है। इस दुख से निजात पाने का सबसे आसान एवं सस्ता तरीका कानून में संसोधन कर गर्भपात का अधिकार मां को देने की वकालत की गई।
नारीवादी ऐक् टिविस्टों यहां तक कानूनवेत्ताओं का भी मानना था कि विकलांग बच्चों की परवरिश का अतिरिक्त बोझ मां को ही ढ़ोना पड़ता है तथा कइयों की गृहस्थी विकलांग बच्चों की वजह से टूट जाती है। अतः मां को विकलांग बच्चे के गर्भपात की छूट होनी चाहिये।इस तर्क को देते समय नारीवादी ऐक्टिविस्ट व कानूनवेत्ता भूल गए कि बच्ची को पालने का अतिरिक्त बोझ भी मां को ही ढ़ोना पड़ता है तथा कइयों की गृहस्थी बार बार बच्चियों के जन्म की वजह से टूट जाती है। इसीलिए अब युगल सयाने होगए हैं और परिणाम हमारे सामने हैं।
अ-विकलांग समाज उनकी क्षमता में अविश्वास व्यक्त करने में कोई कोताही नही बरतता। दुर्भाग्य से तथाकथित विकसित देशों की मानसिकता भी विकलांगों की क्षमता में अविश्वास करने की है। विकसित देशों का संदर्भ महत्वपुर्ण हैं । कारण वहा विज्ञान तकनीक का उच्च स्तर का विकास हुआ है जिसकी वजह से विकलांग अपने अक्षम अंग की कमी की काफी हद तक भरपाई कर पा रहे हैं साथ ही अधिक से अधिक संख्या में उचित शिक्षा पाकर समाज की मुख्य धारा से जुड़ रहे है।

विज्ञान का यह करिष्मा भी दोधारी रहा है। दवाओं से विकलांगता का इलाज तो नही संभव हुआ है। लेकिन लंबी आयु संभव हुई है। बुढ़ापे व बीमारी की वजह से विकलांगों की संख्या में इजाफा हुआ है।विज्ञान और तकनीक ने जीवन की रफ्तार बढ़ाई तो इससे भी विकलांगता में इजाफा हुआ। प्राकृतिक साधनों को दोहन की गति भी तीव्र हुई। पर्यावरण का संतुलन बिगड़ा। प्रदूषण फैला। अमीर व गरीब के बीच की खाई चौड़ी हुई। कुपोषण बढ़ा।समाज में हिंसा बढ़ी। इन सब कारणों से विकलांगता भी बढ़ी।
विज्ञान और विकलांगता के इस घालमेल में द्वितीय विश्व युद्ध मील का पत्थर साबित हुआ। इस युद्ध में विकलांग हुए करीब दो हजार अमेरिकी सैनिक दवाइयों और तकनीकी मदद से लम्बे समय तक जिंदा रहे। इसके बाद तो जो नई नई दवाइयां, ओपरेशन की तकनीक आई उससे अमेरिका सहित समस्त विकसित देशों में लंबी जिंदगी संभव होगई। बुढ़ापा अपने साथ अक्सर विकलांगता लाता है।इस प्रकार विकलांगों की संख्या बढ़ी। साथ ही राज्य की बूढ़े विकलांगों की देखभाल की जिम्मेदारी भी बढ़ी।
जिम्मेदारी को निभाने के लिए नीति की आवश्यकता पड़ी।इसी बीच युवा विकलांग समाज में अपने लिए सम्मानजनक वातावरण तैयार करने में लगे थे। वातावरण तैयार करने की इस प्रक्रिया में उनको कदम कदम पर एक ऐसी व्यवस्था से टक्कर लेनी पड़ी जिसमें विकलांगों के लिए कोई स्थान नही था। यही से विकलांगों के अधिकारों के आंदोलन की शुरुआत हुई।वहां विकलांगों के लिए शिक्षा व रोजगार पाना सामान्य प्रक्रिया तो होगई है। फिर भी विकलांगों की क्षमता में अ-विश्वास बदस्तूर जारी हे।इस अ-विश्वास की कई बानिगिया शैपिरो ने अपनी पुस्तक नो पिटी में दी हैं उनमें से एक इस प्रकार है।

संयुक्त राज्य अमेरिका में अविकलांग अमेरिकी ही आदर्श रोल माडल माना जाता है।
1993-94 में जोसफ शैपिरो ने दया नहीं पुस्तक छापी। इस किताब में संयुक्त राज्य अमेरिका में विकलांगों के अधिकारों के संघर्ष की दास्तां है। इस दास्तां का प्रारंभ शैपिरो अ-विकलांग अमेरिकी लोगों की विकलागों को अपने मापदंडों से मापने की आदत का ब्यौरा देकर करते हैं।ब्यौरा अत्यतं सटीक है। शैपिरो बताते हैं कि विकलांगों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले प्रसिद्ध वकील तिमोथी कुक को बचपन में ही पोलियो होगया था। इसलिए उनको पावों में भारी जूते पहनने पड़ते थे। उन जूतों की वजह से कुक को चलने में असुविधा होती थी।लेकिन कुक ने इसको कभी एक बाधा नही समझा।सामान्य जीवन जिया। विकलांगों के अधिकारों के लिए जीवनपर्यत्न लड़ते रहे। इसीलिए शायद उनकी स्मृति में आयोजित सभा में अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए उनके दोस्तों ने कहा कि उनको कभी एहसास ही नही हुआ कि तिमोथी कुक विकलांग थे। या जिन लोगों से हम मिले हैं उनमें कुक सबसे कम विकलांग थे। ऐसा कहते हुए इन दोस्तों को लेसमात्र भी नही लगा कि वे विकलांगों को हेय नजर से देख रहे थे। य़ह कुक को क्षद्धांजलि नही थी। कुक के विकलांग दोस्तों का इस तरह के बयानों से दिल टूट रहा था। उनको इस बात का भान ही नही था कि विकलांगों के लिए अस्मिता का प्रश्न उतना ही महत्वपूर्ण था जितना किसी भी समाज या समुदाय के लिए होता है।

बुधवार, 13 अगस्त 2008

Cure the disease not the symptoms

The Bombey High Court in a landmark judgement refused to permit a young couple Haresh and Niketa Mehta, to abort 25 weeks old foetus. The general sympathy was with the Mehtas. Since the emotional strain and extra burden of rearing up a physically challenged child is generally born by the mother. It is generally argued that the mother should have the ultimate right to decide the fate of foetus. Even many women’s right activists supported this line. They did not realize that the extra burden of rearing up girl child also falls on women. Many wives are deserted for giving birth to girl children only. By the same logic should such mothers be given right to decide the fate of female foetus?
Sometimes back a doctor friend was utterly shocked when her colleagues supported abortion of female foetus on the ground that the women generally lead a miserable life. Abortion of female foetus protects them form that misery. After Court’s ruling many mothers including Niketa Mehta gave similar argument---That the life of physically challenged child is so miserable that bringing such a child in this world increases agony of both the child and the parents.
But if one looks around and sees physically challenged persons one finds that they are engaged in constant battle to overcome their disability and to make positive contributions to the society. They are full of life with lots of hopes and expectations. On the other hand in spite of their achievement, the non disabled sections of the society refuses to recognize their individuality, self esteem and separate identity. To day the developments in the field of science and technology have greatly enabled physically disabled persons. Unfortunately the same advanced science and technology is facilitating their total annihilation before birth. A few years back I remember reading news about protests in USA by speech and hearing challenged persons against aborting foetuses having speech and hearing abnormality. They wanted their identity to be protected. In ancient times when life was hard, .and physically challenged children were totally dependent on their family they were deprived of their right to life. Even twins were killed. Advancement in the field of modern science and modern technology have helped them to lead a wholesome normal life. Once they ceased to be a liability, they got right to life. Now all parents seem to be wanting child prodigies. Though many children with special needs have proved to be child prodigies but parents do not believe. The old attitudes of viewing people with special needs as liability still persist. As a result , in the present era of human rights with all the possibilities of enjoying normal life, the right to life seems to be giving way to right to pro-choice.
It is estimated that 10 percent of each country’s population is physically challenged. In developing country the proportion is higher. Due to increase in poverty, environmental pollution the incidents of disability are also increasing. Terrorism and other kinds of violence are also causing disability . The need of the hour is to counter the factors responsible for this increase in incidents disability. Secondly, to demand that the state share greater responsibility in rearing and looking after the physically challenged persons should be raised .